सोमवार, 29 सितंबर 2008

सिंह इज शेम

पहले १३ सितम्बर, और फिर २७ सितम्बर , लगातार हो रहे विश्फोटों से राजधानी दिल्ली बुरी तरह से दहल उठी है। अल्पसंख्यक तुष्टिकरण की राजनीति ने हमारे देश को विनाश के एक ऐसे खतनाक कगार पर खड़ा कर दिया है, जहाँ से वापस आना असंभव है।
ढुलमुल रवैया और ख़राब आतंरिक नीतियों के कारण भारत पहले ही बहुत बरब्बादी देख चुका है, लेकिन, अब आम बहुसंक्यक समुदाय और आम भारतीय नागरिक अपने आप को असुरक्षित अनुभव कर रहा है।
प्रधानमन्त्री और गृहमंत्री जी वही रटा रटाया सा भाषण देते हुए नज़र आ रहे हैं।
लज्जास्पद अनुभव तब होता है, जब हमारे ही नेतागण सांत्वना देने ( या फिर मत प्राप्ति की राजनीति ) के बहाने आतंवादियों के परिजनों के पास जाते हैं और सार्वजानिक रूप से साक्षात्कार में उनको निरपराध और अबोध घोषित कर देते हैं।
आवस्यकता है एक कठोर विधान की, जो तथाकथित धर्मनिरपेक्ष राजनीतिज्ञों की इन स्वार्थापरायक राज्ज्नीति को बहिष्कृत करते हुए दोषियों को कठोरतम दंड देने का प्रावधान रखे।
आँख के बदले आँख, यही सूत्र एक सफल युक्ति सिद्ध हो सकती है।